पिंडरई का आनंद





मंगेश ने मुझे बताया की शायद मैं शनिवार ५ जून २०२१ को पिंडरई जा सकता हूँ|  मेरे मन में काफी दिनों से पिंडरई जाकर रात भर रुकने की इच्छा थी | एक बार मैं और गोलू १२ मई १९८८ को स्कूटर से गए थे तब  बुआ ने  हमारे लिए बेसन भात बनाया था  चूल्हे पर - उस समय गैस नहीं होता था हर घर में , चावल भी जीरा शंकर था |  हम दोनों ने हर बार की तरहा  भर पेट खाया था और ऊपर छत  पर सोये थे , तब से मेरे मन में वो अनुभव दोबारा लेने की इच्छा थी |  
हम लोग कार से न जाते हुए मंगेश की गाड़ी से निकल पड़े लगभग ११ बजे , खवासा Iमें जीजाजी के "सूंदर" घर में स्वादिस्ट भोजन करने के बाद हमने कुरई  से हाईवे छोड़ दिया और टाइगर कॉरिडोर के रास्ते हो लिए | 







रास्ता बहुत खूबसूरत था - जंगल सुखी नदियां छोटे छोटे खपरैल के चाट वाले गांव |  मस्ती करते हुए बच्चे | 






रास्ते में सकाता  गांव  में १९०३ में बना सुन्दर रेस्ट हाउस है , एकदम शांति और प्रसन्नता है उस जगह में | उसको देखने के बाद मन में ठान लिया की दोबारा वहाँ ३ से ४ दिन के लिए रहने जाऊंगा | 






बारिश की शुरुवात अभी नहीं हुई थी लेकिन जंगल हरे भरे होना शुरू हो गए थे | 








शाम को पांच बजे हम लोग डौंडीवाड़ा , गंगेरुआ , अरि होते हुए बरघाट पहुंच कर बेबी दीदी के यहाँ बढियाँ वाले पकोड़े और गुलाबजामुन खा कर पिंडरई लगभग शाम ढलने के पहले पहुंचे।
जितना मै  खुश था पिंडरई पहुँच कर, बुआ मेरे से कई गुना ज्यादा खुश हुई | उन्हें लग रहा थी मैं  क्या खिलाऊँ और क्या नहीं | मेरे बार बार बोलने के बाद भी उन्होंने बेसन नहीं बनाया | उन्होंने पूरा खाना खिलवाया | 

इस वक्त जाने का फायदा ये हुआ की बुआ ने घर के पेड़ों पर लगे हुए और घर पर पकाये हुए आम खिलाये और आम का रस और अलग अलग पापड़ जो मुझे बेहद पसंद है वो खिलाया मैंने भी सोचा अब क्या शरमाना |  इतना बढ़िया खाना और आम का रास पप्पड़ , खाकर उठाने के बाद पता चला की कुछ ज्यादा ही खा लिया था | 

मंगेश  और अपने नाती प्रबल के साथ बुआ 



मैं और बुआ 




बाद में शुरू हुआ पीछे के आँगन में फुर्सत में  बैठ कर बातों का सिलसिला,  नहीं वर्णन कर सकता शब्दों में की मुझे कितना आनंद आया बतियाने में | 


सबसे आनंद आया मनीष की बेटी चिंकी के साथ बात करके | बहुत ही सीधी लेकिन बातूनी , नयी नयी बाते सीखने की जानने की अद्भुत ईच्छा | बहुत ही अच्छी लड़की है और वो जरूर बहुत आगे जाएगी ये मेरा मन बोलता है |  







घर के आम का माछ (पकने के लिए रखे हुए आम)

हमारे लिए पके आम निकलते हुए बुआ | 

बाएं से - चिंकी (कनक), बुआ, सिम्पी , प्रबल और मनीष 






रात को बात करते करते मंगेश पहले लुढ़क गया और मैं बाद में | फिर सबेरे बुआ ने बहुत ही टेस्टी आलूबोंडे (मराठी में) आलू के पकोड़े खिलाये नाश्ते में | वो खाकर हम लोग वापिस निकल पड़े | 
रास्ते में हम जब रुके तब मंगेश ने बताया की महुआ के पेड़ का फल का बीज है जिसको बोलते है  गुली | मुझे तब पता चला की  नैनपुर मैं "गुली" का सीजन मतलब महुआ के फल का बीज से जो तेल निकलता है उसको बोलते है गुली का तेल | 



महुआ पेड़ का फल 

गुली (महुआ का बीज)



मुझे विक्रम सेठ कि लेखी हुई एक लाईन बेहद पसंद है 

“I travel to collect fodder for future  nostalgia!”


पिछले फ्यूचर नॉस्टॅल्जिया को मजा लेने  मै  पिंडरई  आया लेकिन एक और ना भूल सकने वाला अनुभव और बुआ और सब का प्यार मैं  साथ लेकर आया फिर से कभी जल्द बुआ के यहाँ जाने के लिए-----अगला मेरा बहाना रहेगा बेसन  | 
















 

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